किरदार
मैं अनजान तमाम ख़्वाहिशों की गुलाम बन जाती हूँ, ख़ामोश-सी कहानी का अंजाम बन जाती हूँ। जो बेबस-सी सदाएँ कहीं बसती हैं, उन सभी सदाओं का पैग़ाम बन जाती हूँ। कुछ इस क़दर मैं अपना किरदार निभाती हूँ। कभी चहकती हूँ चिड़िया-सी, और कभी गुमसुम शाम बन जाती हूँ। कभी खिल उठती हूँ फूलों जैसे, कभी कोई गुमनाम पत्ती बन जाती हूँ। कुछ इस क़दर मैं अपना किरदार निभाती हूँ। नहीं चाहत रखती बेतहाशा खुशियों की, बस हर किसी के होंठों की मुस्कान बन जाती हूँ। किसी बेसहारा दिल में जो कोई सवाल देखूँ, तो उस सवाल का जवाब बन जाती हूँ। कुछ इस क़दर मैं अपना किरदार निभाती हूँ। नहीं फ़ुर्सत मुझे एक लम्हे की भी, फिर भी तसल्ली का सामान बन जाती हूँ। जब थक जाती हूँ माँ, पत्नी और बहन बनकर, तब मैं एक आम इंसान बन जाती हूँ। कुछ इस क़दर मैं अपना किरदार निभाती हूँ।
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