रुख़
कब किसको मुक़म्मल जहां मिला है, किसी को ज़मीं तो किसी को आसमां मिला है, दौर ऐसे भी दिखाए ज़िन्दगी ने "अज़ीज़" बस वक़्त से ही हमें गिला - शिकवा रहा है, @"अज़ीज़" निखिल
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