मन
चंचल मन की सीमा नहीं विचरण करता यह जहाँ कहीं हर बार उकेरता नयें रंग नये विचार, नये प्रसंग पथ से भटकना इसका रुझान हरदम उत्कल, हर पल प्रशांत सागर से इसका मेल नहीं कोई माप ले इसे, खेल नहीं बागडोर है इसका सबके पास बस में करना पर नहीं आसान बेलगाम घोड़े सा यह हर पल रहता विमुढ़,भ्रांत पर तुम इसके हो सवार तो पकड़ो लगाम, लो उसे तान पथ पे रखना है तुम्हारा काम मंजिल अभी है दूर कहीं पथ से भटक सकते नहीं।
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