आधार छंद-- अमृत ध्वनि
विधान-- दोहा+मधुर ध्वनि शीर्षक-- संस्कारी संस्कारी बनकर रहो, करो श्रेष्ठतम कर्म। दया भाव रखना सदा, मानो मानव धर्म।। मानो मानव, बनो न दानव, हे नर-नारी। ईश भजन कर,रहना बनकर, परोपकारी।। जीवन नश्वर, भज लो ईश्वर, हे संसारी। नेकी करना, छाव न धरना, बन संस्कारी।। संस्कारी जो नर यहाँ, जाने अपना मूल। जिसे पता रहता सदा, मानवता की भूल।। मानवता की, ज्ञान खता की, जाने सारा। रहकर मानी, बनकर दानी, यह बेचारा।। मनुज धर्म का, श्रेष्ठ कर्म का, है अधिकारी। रहकर त्यागी, वह बढ़भागी,जो संस्कारी।। नरेंद्र सिंह
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