दोहा
चलो गाँव की ओर। शहर बहुत अब रह लिया, चलो गाँव की ओर। शुद्ध हवा मिलती वहाँ, नहीं तनिक भी शोर।। छोड़ बड़ा घर गाँव का, किए नगर में वास। यहाँ मनुज सिमटे हुए, झेले सब संत्रास।। भाव-प्रेम जो गाँव में, मिले न शहर प्रवास। चलो गाँव की ओर अब,अपना स्थल वह खास।। शहर लगे मनहूस अति,सबके मन में चोर। जन्म भूमि बिंदास है, चलो गाँव की ओर।। गाँव नहीं वीरान हो, इस पर करना गौर। राशन देता गाँव ही, बना रहे वह ठौर।। नरेंद्र सिंह, 25.04.2025
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