नींद का मुसाफ़िर
वो नींद, जो सबके दरवाज़ों पर दस्तक देकर गुज़र जाती है, मेरे घर का रास्ता जैसे भूल ही जाती है। थकी हुई आँखों में रेत सी चुभती है ये रात, पर ख़्वाबों की चादर सरक कर दूर निकल जाती है। सबके लिए जो सुकून है, मेरे लिए वो शोर है, मेरे अंदर इस सन्नाटे का कोई और ही ज़ोर है। जब दुनिया सोती है, तो मेरे ख्यालों का बाज़ार सजता है, एक खालीपन है सीने में, जो संगीत की भाती बजता है। दीवारों को तकते अब रातें पुरानी हो गईं, तारे गिनने की वो बातें अब बेमानी हो गईं। मैं अँधेरे से पूछती हूँ—"बता, मेरी खता क्या है?" ये जो जगती आँखों का बोझ है, इसकी दवा क्या है? सुकून की तलाश में मैं खुद को कितना थकाती हूँ, पर जितना करीब जाऊँ, मैं उतना ही दूर पाती हूँ। ये जागना भी एक जंग है, जो मैं खुद से लड़ रही हूँ, बिन चले ही रास्तों पर, बेवजह बढ़ रही हूँ। ऐ नींद! कभी तो मेरे सिरहाने आकर बैठ, मेरी इन जलती आँखों में थोड़ा पानी बनकर बैठ। उजाला होने से पहले, ज़रा सा आराम दे मुझे, इस शोर भरे सन्नाटे से, ज़रा पीछा छुड़ाने दे मुझे।
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