इल्तज़ा
थी आरजू उनसे कुछ कहें गर सोचते रह गए क्या कहें... था मुश्किल पहली दफा गुफ्तगू करना मन की चंचलता से इल्तज़ा करना क्या कहें हम उनसे यही थी दुविधा खुद ही मोल ले ली थी हमने जो विपदा थी आरजू उनसे कुछ कहें गर सोचते रह गए क्या कहें...।। हुआ तय इल्तज़ा की हमने शुरू हो कहानी लिखी जो रब ने सकुचाते हुए मुदित मन से हमने दुआ की उम्मीदों के उजालों से पहल जो की थी विडंबना गर कहा कुछ उन्होंने निश्छल प्रवाह को पढ़ लिया जो इन्होंने तो अकिंचन हुए मन को क्या बताए हम था उनको भी इंतजार ये समझाए हम थी आरजू उनसे कुछ कहें गर सोचते रह गए क्या कहें...।।
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