क्या लिखूं....?
तेरे ऊपर आ कर खत्म होती मेरी सारी कविताऐं हैं, किस तरह तुझे और निखारा जाए ये हमारी समझ से परे है.... सुनो ना!!! वो एक पन्ने की कागज़ तरस रहा है कलम की स्पर्श को, और मैं इस बार कुछ सोच भी न पा रही हूं, क्या लिखूं .....? लिखना तो है,पर क्या.....? सुनो तो!!! वो हमारी पहली मुलाकात लिख दूं क्या, जो हम दोनो एक दूसरे को चुप के से देख रहे थे, और जब नज़र मिली तो धड़कन तेज़ हो गई थी .....? या लिख दूं वो पल चांदनी रात की, जो सागर के किनारे एक साथ बैठ कर, चांद को जला रहे थे......? बोलो तो क्या लिखूं .......? सोचती हूं वो किस्सा सजा डालूं कागज़ पे, जो हमारी अपनों ने हमें अलग करने की कोशिश में थे, और इसी बहाने हम और भी करीब आ गए थे, दिमाग में सारी सोच तेज़ रफ़्तार से दौड़ रहें हैं, पता नहीं किसे पकड़ कर कागज़ पे चिपका दूं, तेरे साथ तो हर दिन एक खास पल के बराबर है, किसे लिखूं और किसे छोड़ दूं ........?
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