रीझ रहा बेवजह मन
आज दिल बहुत बेचैन है बेवजह रीझ जा रहा है जरूरत उनके दो लफ्जों की मेरा ग़म मुझे खाए जा रहा अब और कैसे कहें ,कैसे अपना हाल बताएं न समझ तो है नहीं वो, उनकी बातों के बगैर चैन आए नहीं माना होगा लाखों काज उन्हें पर क्या उन्हें सुकून नहीं मिलता मुझसे! बस थोड़ा सा ही रीझा है मेरा दिल उनकी यादों में बस खोया है ये मासूम दिल, लाख मर्तबा हमने मिन्नतें मांगी कुछ रातें हमसे भी बांट लो दो बातें कर, पर उनको फुर्सत नहीं वो हमारा हाल पूछें होंगे लाखों काज उन्हें, और मेरा कोई अधिकार नहीं, है पता हमको रहती है बहुत बिजी अपने काजों में तरह तरह की परेशानियां हैं उनके आलय में, नहीं चाहिए मुझको दौड़ते भागते काजो में प्यार बस कुछ ही पल चाहिए सुकूं की रातों में यार, कभी कभी मेरा भी मन मान लिया करो न चाहते हुए भी बस थोड़ा सा कुछ बोल लिया करो, कर लो दो चार ही बातें जिनमें हम दोनों हों कुछ तुम कहती कुछ हम कहते यूं ही हम एक दूजे में हों, है बहुत खिन्न ये मन मेरा , तुम मुझको क्या समझती हो हूं बोझ तुझ पर ;तुम ये तो न समझती हो, कैसे कहूं तुम रोज बहुत याद आती हो दिन में न ही सही, ढलती शामों और रातों में कुछ बातें कर लेती कुछ मीठी मीठी बातों से मेरा मन ही बहला देती।।
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