शीर्षक :कसूरवार कौन
गंगा पर ग्रहण लगा,है कसूरवार कौन, माता के अमृत पय को,है विष बनाया कौन। करने जनकल्याण ही,उतरी थी ये गंगा, इसके पावन नीर से,नर होता था चंगा। पर रे मानव क्या किया,अपने ही कर्मो से, इसे गंदा कर डाला,तुम बन बेशर्मो से। बहाते हो इसमें शव, और नाले का पानी, कारखाने के कचड़े,डाल रहे मनमानी। अब शेष बचा क्या है,इसकी खत्म कहानी, बस लोग पढ़ेंगे कभी,ये थी माता रानी। धरा को निरोग करने,ये उतरी थी गंगा, पर यही अब रुग्ण हुई,कौन करे इसे चंगा? इसके उद्धार पर अब,सभी साधे है मौन, क्या होता है देखिए,भागीरथ बने कौन? नरेंद्र सिंह, अतरी,गया 31.12.2024
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