कहाँ गई बचपन की होली?
कहाँ गई वो बचपन की होली, जहाँ रंगों में बसती थी तोतली बोली। ना था कोई छल, ना दिखावे का रंग, बस मिट्टी की खुशबू, और हँसी के संग। गुब्बारों में भरी थी खुशियों की धार, पिचकारी की धार में था दिल का प्यार। गली-गली दौड़ते थे बिन किसी डर, हर चेहरे पे सच था, ना कोई मुखौटा उधर। ना महंगे रंग, ना बड़े दिखावे, बस दोस्तों संग दिल से बहलावे। गालों पे रंग, मन में उजियारा, हर होली लाती थी नाता प्यारा। अब तो रंग भी जैसे चुप से हैं, चेहरे मुस्कुराते, पर मन थमे से हैं। रिश्तों में घुल गया जैसे कोई फासला, रंग लगाने से पहले पूछते हैं रास्ता। अब रंग भी महंगे, दिल भी तन्हा, हर कोई अपने मतलब का सगा। कहाँ हैं वो पक्के रंग जो न छूटे? कहाँ हैं वो अपने, जो न रूठे? काश लौट आए बचपन के वो दिन, जहाँ हर रंग में छुपा था सच्चा पन। तो पूछता है मन हर साल, "कहाँ गई बचपन की होली की चाल?" ना वो रंग, ना वो खेल, बस यादें हैं — जो सच्चे रंगों की तलाश में भटकती हैं।
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