द्वंद - स्वयं से..
मैं हूँ तो नास्तिक... पर बनूंगा एक दिन आस्तिक। लेकिन उस तरह का नहीं जो भीड़ का हिस्सा बनकर धूप-अगरबत्ती से परमात्मा को रिझाए, या मनौती के बदले सौदा करे श्रद्धा की मुद्रा में। नहीं... मैं बनूंगा आस्तिक, उससे मिलने के लिए जो अदृश्य है, लेकिन कहा जाता है—हर जगह है। पर सवाल मेरा यही है—हर जगह है, तो करता क्या है मैंने देखा है— लोग मंदिरों में जाकर उससे मांगते हैं... और उसी मंदिर की सीढ़ियों पर एक भूखा इंसान हमसे कुछ मांगता है। तो क्या मैं उस भूखे को समझाऊं, या खुद को जो अभी मांग कर आया हूँ उसी से? साफ दिखता है तब— कि शायद वो जिसे हम ईश्वर कहते हैं, उसके लिए कोई अंतर नहीं कि कौन एक दिन आया और कौन हर दिन वहीं पड़ा है। तो क्या वो न्याय नहीं करता ? या वो मौन है? या फिर हम ही उसका अर्थ नहीं समझ पाए हैं? कुछ कहते हैं—वो नहीं मिलेगा, क्योंकि वो बाहर नहीं, भीतर है। तो यदि भीतर है, तो कोई बताए— कैसे जगाउ उसे ?कैसे दिखाउ उसे यह संसार, जहाँ मनुष्य ही नहीं, जानवर और जीव तक पीड़ा में हैं? मैं आस्तिक बनूंगा, लेकिन किसी चमत्कार के बाद नहीं, किसी चमत्कारी कथा से नहीं, बल्कि एक संवाद के बाद। उससे जिसे लोग "वो" कहते हैं— कभी परमात्मा, कभी ब्रह्म, कभी ईश्वर। मेरा संवाद होगा उससे सीधे—निडर, निर्विकार, निस्वार्थ। और वो संवाद होगा देखने लायक— जैसे दो आत्माओं के बीच एक पुरानी पर भूली हुई पहचान की मुलाकात।
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