हम बड़े हो गए
*हम सब बड़े हो गए* आज बड़े दिनों बाद मैने अपनी कलम उठाई, फिर लिखते लिखते मुझे याद आया की आज मैने खाना ही नहीं खाया था, ऐसा मेरे साथ पहली बार हुआ था क्योंकि बचपन में हम खाते कहा थे, हमे तो खिलाया जाता था। छोटे थे जब हम बड़े होने के खूब सपने सजाते थे , अब बड़े हो गए तो लगता है कि आखिर क्यों हम सब बड़े हो गए। बचपन में ‘जिम्मेदारी‘ शब्द जो लिखना भी नहीं आता था, आज उसका सामना यू अकेले करना पड़ेगा किसे पता था? पढ़ाई लिखाई,दोस्ती यारी और परिवार में ही हमारी हस्ती थी, जेब में भले ही अठन्नी न थी पर सुकून और भरपूर मस्ती थी। शौक हमे भी बेहद था दौलत शौहरत कमाने का , जब लगे हम सब कमाने तो लगा वो बचपन हो अच्छा था। भाई बहनों से छोटी छोटी बातों पर लड़ने से लेकर बड़ी बड़ी मुसीबतों तक पर हसने को मजबूर हो गए, हां हम सब बड़े हो गए। वो दिन जहां हम एक भी काम सही से नहीं करते थे, याद बड़े आते है, क्योंकि अब हम आधी गलती करने से भी डरने लगे थे। जब प्यार सबका सच था,शरीर कच्चा और मन सच्चा था हा वो बचपन ही अच्छा था। किसी के छोटा कहने पर चिढ़ जाने से बड़प्पन के सफर पर हम चल दिए, एहसास हो गया इस बात का हां हम सब बड़े हो गए। लगता है कि वो अधूरे काम ,टूटे खिलौने और आशा भरे सपनों का समय अधूरी फाइलों, टूटे ख्वाबों और निराश जिंदगी से लाखों गुना बेहतर था , अब होता है अफसोस की ,बड़े होने का वो सपना महज एक पागलपन था। हा हम सब बड़े हो गए
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