क्या करूं.....
क्या करूं उलझने बहुत है, सुलझाऊं कैसे बावरा दिल बेचैन है, चैन लाऊं कैसे और डूब रही नईया मन के भीतर, पार लगाऊं कैसे है चेहरे पर मुस्कान, पर आंखों की उदासी छुपाऊं कैसे क्या करूं उलझने बहुत है, सुलझाऊं कैसे पतझड़ का मौसम है, बसंत बताऊं कैसे उनको यकीन नहीं मुझपे, यकीन को यकीन दिलाऊ कैसे और कह दिया तुमने बड़ी आसानी से, कि इश्क नहीं मुझे तुमसे तो अब तू बता तेरी याद को, मैं दिल से मिटाऊ कैसे कैसे भूल जाऊं उन लम्हों को, और तेरे दिए हुए खत को जलाऊं कैसे क्या करूं उलझने बहुत हैं, सुलझाऊ कैसे ये वक्त की मार है "रोशन" जख्म उसे दिखाऊं कैसे बहती हैं अश्रु, आलिंगन से लगाऊं कैसे आसान है ख्वाब-ए-अदम, शब-ए-हिज्रा चिराग जलाऊं कैसे
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