दस्ताने
क्यों पूछते हो हाल मेरा , मैं धीरे धीरे मिटता जा रहा हूं, बेरोजगारी की मार ऐसी अपना ही वजूद खोता जा रहा हु, लगता है, किस्मत नाराज़ है और नसीब रूठा है , मेहनत का फल मीठा कहने वाला हर सख्श झूठा है, एक अंदाज भी है मेरा की मैं, अपनी तमाम मुश्किलें छोड़ कर सब में खुशियां बांटता फिरता हु शाम सवेरे मिलने वाले हर सख्श से हस कर मिलता हु ,
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
