एक और निर्भया....
कहीं दरिंदो की आहट देखी , कही प्रशासन की खाक मिली ... आज फिर एक निर्भया, पड़ी नहर के पास मिली, पाया अकेला खुद को , मैं अनहोनी भांप गई ... देख बर्बरता जानवरों सी , रूह भी कांप गई , किस बात की सजा दी , मैं हिसाब सब का लगाऊंगी , जन्म कोई मिले ,न मिले पर लड़की बनकर नहीं आऊंगी इतनी चीखी , जितनी चीख मेरे अंदर थी , सूर्य सा तेज नहीं , मैं चन्द्र सी शीतल थी , अगर बेकसूरी का सबूत मुझ से मांगा है , तो पूछो चार दिशाओं से , मैं तय दायरे के भीतर थी !
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
