- किताब-
सुनो, मैं पढ़ना चाहता हूँ ऐसी किताब जिसमें न हों प्रेम के गीत और न ही मनोहारी कहानियाँ वह किताब न करती हो प्रेमिका के सौंदर्य का बखान न उसमें अच्छादित् हो केवल सुख की कल्पना का आभासी आसमान मुझे चाहिए ऐसी किताब जो आवरण से अंत तक कराती हो जीवन के सच का अहसास मेरे मन को पढ़ा दे मर्म का पाठ दिखा सके कोरी कल्पना के पार हर जीवन में सुख के बाद व्याप्त दुखांत जिसके हर पन्ने पर अचेत पड़ा हो समय की ठोकर से कराहता क्षण भंगुर सुख कुछ पन्नों के मुड़े कोनों में सिर छिपाएं पड़ी हों नकली मुस्कुराहटें जो दिखा सकें फर्क सच और झूठ के बीच मैं चाहता हूँ वह किताब जो झंकृत कर दे मेरा अंतर्मन बनावटी, स्याह इबारत को मिटा मन के श्याम पट पर लिख सके सफेद सच जो रेडियम की तरह जगमगाता रहे सुख और दुख की मध्यम रोशनी से मैं पढ़ना चाहता हूं उस किताब को जिसे पढ़ने के बाद मैं बिलकुल वैसा न रहूँ जैसा था किताब पढ़ने के पहले! - शैलेंद्र
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