प्रिये का उलाहना चांद से
तेरी डाह सहें तो कैसे , तेरी राह तके भी तो कैसे , डरती हूं पर नटती भी हूं , तेरे आने और तेरे ना जाने से । कल तेरे दर्शन से प्रेम रूठा था, आज तेरे दर्शन से व्रत पूरण था। तेरी चमक चांदनी है रती व्रती -सा , या की व्रत पूरण या की तुड़वाने में । रहा प्रतिक्षी कोई तेरे उगने में कब से , है और भी कोई प्रतिक्षि तेरे जल्द छिपने में , पर तू तो हठी बना बैठा पूर्णिमा के बहार में , है भूल गया क्या ,है प्यार आशिक़ी बहार में। ऐ चांद कुछ तो शर्म कर ना जला अब , अपनी शीतलता को ना दाहक बना , तड़पती ,तरसती आंखों को पयाम दे , जा छिप जा अब उनको भी आराम दे ।। सोच जरा अब ना देर लगा है तो व्रती वह भी है संजोए अरमान सती -सा वह भी प्रेयसी जग तो बेवश, हठी लाचार बना बैठा , भार ऊंच -नीच का सिर लादे बैठा , पर तू तो युगपुरुष ठहरा है तुझसे छिपा क्या तूने कितने जौहर देखें , देखें कितने परवाने बदले रूप, भेष , और काल कितने ही , पर रही बनी बस वही रीति- प्रीति की ।। वह ना जाने रीति , देश -काल चलन , वह ना जाने वेश -भेष और जन-जीवन, वह ना जाने रूप -गुन , जन-धन सब , और ना जाने प्रतिबंध नूतन जन की ।। पर नही निर्लज्ज, है बना सलज्ज अभी भी , माने सब रीति -प्रीति पर बस अपना ही , हे ! चांद जाओ छिप अभी ,और जाने दो , प्रित प्रियतम की अभी मुझे निभाने दो ।। छूं चरणों को अभी चली आने दो, व्रत पूर्ण अभी हमें भी कर आने दो ।। उमाकान्त -
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