नज़ने क्यों?
नज़ने वो कैसे समय का फिरा था मांगे एक बच्चे की तरह नहलाया जा रहा था एक बच्चे की तरह कंधे पर उठाया जा रहा था उस वक्त थे सभी अपने मेरे लेकिन में उनके मन से भुलाया जा रहा था मुझे मेरे प्रिय कुर्सी की जगह जमीन पर लेटाया जा रहा था में सोया था इस कदर की मुझे रो रो कर उठाया जा रहा था उनके सामने होकर भी मुझे उनसे अलग बताया जा रहा था सब जानते थे मेरा खौफ आग से फिर भी मुझे उसी में जलाया जा रहा था।।
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