एक स्त्री की कहानी
ओ! स्त्री, जल्दी करना पति के कपडे इस्त्री| तुम्हारा काम है सहना, और हाँ-हाँ कहना| तुम्हें नहीं रोका किसी ने सोचने से, पर रहेगा परहेज सदैव तुम्हें बोलने से| ओ! त्रिया, तू तब तक है अपने पति की प्रिया, जब तक तू ना दे कोई प्रतिक्रिया| तुम्हारी बातों को भी सुना जायेगा, ऐसा तुम्हें हर दिन कहा जायेगा, पर वो दिन कभी नहीं आएगा| कहेंगे तुम्हें लेने तुम्हारे सपनों का राजकुमार आएगा, पर तुम उसकी राजकुमारी बनोगी या नहीं ये नहीं बताया जायेगा| बस घर का काम- काज, यही है तुम्हारा कल और आज, ये नहीं खोलेगा कोई राज, पर पता चलेगा तुम्हें बिदाई के कुछ ही क्षणों बाद| ओ! नारी, तू वो है जो कभी ना काम से हारी, और ले तू घर की ज़िम्मेदारी सारी| बस बेटी की बिदाई, यही है एक पिता के हर रोग की दवाई| ओ!औरत, तू है तब तक अपने घर की शोहरत, जब तक तू ना मांगे काम से मोहलत| जो कुछ है वो बस है तेरा पति, चाहे होना पड़े उसके लिए तुझे सती| चाहे तू माँ है, बेटी है, बहु है या फिर है बहन, तेरे लिए रिश्ते निभाने का अर्थ है तू बस करती जा सहन, नहीं खायेगा तुझ पर कोई भी रहम, एक दिन ले डूबेगा समाज को यही अहम्| -वर्षा कँवर
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