:होली की खुमारी (चौपाई )
सन-सन बहती है पुरवाई। अब तो उमंग मन में छाई।। शीतल बसंत बहके जब-जब। महके समीर सुगंध तब-तब।। कामदेव भी है अब लज्जित। रति भी रहने लगी सुसज्जित।। तरु-पल्लव पर रंग सजे हैं। हर मन में अ ब हर्ष बजे हैं।। सब पर होली लाद खुमारी। जन-जन की ये मति है मारी।। मस्त सभी हैं अब अपने में। लोग लगे खोने सपने में।। बच्चे-बूढ़े जवान जो भी। झूम-झूम कर गाए वो भी।। फगुआ सर पर चढ़कर बोले। कितने मदिरा पीकर डोले।। भांग चढ़ा कर झूमे-नाचे। फाग-राग वे रह-रह बाचे।। झाँझ-ढोल पर थिरके हर जन। हर्षित रहता सबका तन-मन।। कोकिल भी अब गाना गाती। डाल-डाल पर वे मड़राती।। फगुनाहट छाई पुरवाई। रंग-गुलाल लिए अँगनाई।। नरेंद्र सिंह, गया
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