परवाज किसी के।
कैसे पढ़े कोई जज्बात किसी के, जब झूठे हो सब, अल्फाज किसी के। क्या भरोसा करे ऐसे हम राही पे, जो थे कल किसी के, है आज किसी के। ऐसे कैसे निकलेगा कोई सुर भला, हो गानेवाला कोई और साज किसी के। है इस शहर मे जंगलराज आजकल, है सर किसी के तख़्त- ओ- ताज किसी के। है मोहब्बत बागी दिलो की हसरत, कहाँ होते है मोहब्बत मे समाज किसी के। क्या कभी यह सुना हैं तुमने? बिन हौसले के ऊँचे हो परवाज किसी के।
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