रहष्य
रहष्य =================== ना समजने वालो समज जावो, रहष्य बहोत गहरा है, नारी जाती एक ऊपभोग्या वस्तु नही है, जो तुम्हारे छल कपटके झासे मे आ जये, वो इतनी सरल नही है. मीली किस्मत से, माॅं, बहन, कन्या, पत्नी, ऊस के रुप आनेक है. छाती पे दो टरबुजे, ओर, दो जांघो के बीच दरार, वोही सिर्फ औरत नही है. देखो मत उसे एकही नजर से, वो माता लक्ष्मी, और महाकाली भी है, बांध सख्खा उसे तुमने अब तक, अब वो खुली चुनौती है. अदब मे रहना ऊसका गहना है, वरणा बत्तमीजो तुम्हारी, धकियानुसी सोच को....., सिर्फ नारी नारी ही मात है. समजदार को ईशारा काॅफी है, बाकी आम को तो फीर........, नारी रहष्य का सागर है, नारी रहष्य कास सागर है. =====================
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