मगही दोहा
1 आसाढ़ी के आड़ में,जीव मार के खाय। अइसन निरदै आदमी ,मांस खाय इतराय।। हाड़ चूस मनवइ जसन,खात करई बडाय। ई कसाय के का कही, हत्या कर पघुराय।। 2 अदरा गेल पुख अइलइ,आसाढ़ अंगड़ाय। रह रह के बून बरसइ ,खेत लगल नितराय।। बदरा गरजे जोर से, हिया में भय समाय। बिजली चमकई अइसन,नजर जाय मूंदाय ।। किसनमा के मन हुलसल,मोरी लगल बुनाय। कादो भी होवे लगल, लगत धान रोपाय।। हम्मर मने आस जगल,एसो धान हो जात। धान बेच घर छारबो, सालो खायब भात।। नरेंद्र सिंह 10.07.2024
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