तुम
तुम्हें जब भी लिखने की सोचती हूँ हार जाती हूँ कैसे कोई लिख मात्र दे उसे जो उसे हर किसी से अज़ीज़ हैं कैसे समेट ली इसे सिमित पन्नों में जो एक अहसास हैं सबसे जुदा तुम्हें लिखने की कोशिश तो करती हूँ मगर नाकाम ही होती हूँ हर बार तुम्हें सोच कर अपने होने पर यकीन करती हूँ ज़िन्दगी से शिकवे, मौत से गिले करती हूँ तुम्ही को मान कर कर लेती हूँ यकीन ज़हर के प्यालों पर, और मकड़ी के जालों पर तुम्हें तब भी लिखना चाहा था मैंने जब तुम हार रहे थे अपनी सबसे क़ीमती जीत और तब भी जब पता चला कि तुम्हारी आरज़ू मैं नहीं हूँ तुम्हारा जवाब मैं नहीं हूँ मैं तो बस एक कठपूतली हूँ जो फँस गई हैं किसी किरदार में जो जान कर भी हार रही हैं अपनी जान से सोचती हूँ क्यों अक्सर मौत पर लिखने लगती हूँ आज वजह पता चली फर्क नहीं हैं तुम में और मौत में मौत लिखती भी हूँ तो भी तुम्हें ही को लिखती हूँ. फर्क हैं क्या? क्या तुम मौत नहीं हों? मेरी मौत तो तुम ही थे, शुरू से... Bharti 🌸
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