आखिर कब।
हर बार कागज का पुतला जलाया, अपने अंदर के रावण को कब जलाओगे। हर रोज अपमानित होती सीता यहां, इस कामुकता को कब वश में लाओगे। हर नारी देती अग्नि परीक्षा यहां, अपनी हैवानियत को कब भुलाओगे। खुद से बड़ा ना समझे किसी को, इस अहंकार को कब मिटाओगे। पल पल रिश्ते टूटते यहां, इस क्रोध,लालच से कब पीछा छुड़वाओगे। गैरो की परवाह नहीं, अपना सब कुछ प्यार लगे, इस मोह में कब तक फंसते जाओगे। भाई भाई को दुश्मन लगे, इस द्वेष को कब मिटाओगे। खुद में बदलाव न लाकर, आखिर कब तक कागज के पुतले जलाओगे।
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