वो कहते है.....
वो कहते है की बाते थोड़ी कम किया करो ....अब उन्हे कौन बताए अंदर सन्नाटे कितने हैं वो कहते है आईना थोड़ा ज्यादा देख लिया कर .... कौन समझाए हम आंखों के शौकीन कितने है हंसना लाज़मी है हमारा हर बात पर ..... के हम दर्द से करार चाहते है वो समझते हैं हमे एहसास नहीं दुनिया का ....के हम खुदको बेशुमार चाहते है वो कहते है थोड़ा संभल के चलो .... के हम गिरते इसलिए कि कोई उठाने ना आए रूठा तो हम भी करते थे एक जमाने में ... पर अब चाहते है की कोई मनाने न आए यूंही कट जाए न जिंदगी उनकी बाते सुनते सुनते .... के हम भी अब थके हुए बोहोत है चाहते तो थे साथ ले जाना उनको .... पर उनके लिए रूके लोग बोहोत है वो कहते हैं सुधर जा.. संभाल अपनी दुनिया को .... के जिनको कतरा कतरा संभाला हमने मिटा रहे है हमारे दरिया को संभाल कर कदम रख, के हम संभालेंगे नही अब .... कौन समझाए उन्हें हम भी गिरे बिना मानेंगे नहीं आशिक अलग है थोड़े, चलो.. छोड़ देते है आपको .... कमियां पूरा करे कोई तो, मुबारक हो आपको हम तो वैसे भी फकीर ठहरे, आपके बिना कुछ नहीं मांगते जहां भी रहे आप खुश रहे बस.. इतनी दुआ .... और कुछ नहीं चाहते..... ......और कुछ नहीं चाहते....
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