स्त्री
यदि स्वर्ग कहीं है पृथ्वी पर तो वह नारी उसके भीतर दल पर डाल खोल हृदय के अस्तर जब भी बिठलाती प्रसन्न होकर वह अमर प्रणय के सतदल परमादकता जग में कहीं अगर वह नारी अंधेरों में सुख कर क्षण में प्राणों की पीड़ाहर नवजीवन का दे सकती भर वह अंधेरों पर घर मदिरा घर सुमित्रानंदन पंत जी
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