🌿 "फिर से लौट आऊँ..." 🌿 माँ
🌿 "फिर से लौट आऊँ..." 🌿 माँ-बाबूजी ने जो सपने मेरी आँखों में बोए थे, मैं उन्हें भीड़ में कहीं पीछे छोड़ आया हूँ। दुनिया की दौड़ में इतना उलझ गया, कि अपनों से नज़रें मिलाने से भी कतराया हूँ। उनकी उम्मीदों की सीढ़ियाँ चढ़ न सका, हर मंज़िल पर खुद को ही भूलता गया। वो चेहरा जो मुझे देख मुस्काता था, आज उसी चेहरे पर खामोशी का साया है। पिता की थकी पीठ, माँ की सूनी नज़रें, हर दिन मुझसे एक ही सवाल करती हैं — "बेटा, तू कहीं खो तो नहीं गया?" और मैं... चुप हूँ, सिर्फ चुप। पर अब दिल में फिर एक आग सी जगी है, एक किरण, जो कहती है — "अभी भी समय है, लौट चल, माँ-बाबूजी के वो अधूरे ख्वाब पूरे कर!" उनकी नींदों के बदले जो मुझे चैन मिला था, अब वही चैन मुझे बेचैन करता है। मैं फिर से जीना चाहता हूँ वो वादा, जो बचपन में उनके आशीर्वाद के साथ किया था। अब नहीं रुकूँगा, न थकूँगा, हर कदम उनके सपनों की ओर बढ़ेगा। क्योंकि मैं सिर्फ बेटा नहीं, उनका अधूरा सपना भी हूँ… जो अब पूरा होगा।
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