प्रेम मृत्यु
प्रेम में बस मृत्यु है, मुक्ति नहीं, यह जो रिश्ता है कोई इबादत नहीं। जिसे अपना कहा, वही ज़हर दे गया, उसकी बाहों में भी अब हिफ़ाज़त नहीं। हमने ख़ुद को चुपचाप क़ुर्बान किया, और बदले में मिली कोई क़ीमत नहीं। उसकी हर मुस्कान एक धोखा बनी, अब हँसी भी लगती है राहत नहीं। जिसने कहा था — “मर जाऊँगा तेरे बिना,” वो आज देखता है, कोई हैरानी नहीं। प्रेम ने सब्र सिखाया, दर्द पाल दिया, पर जीने की फिर कोई वजहत नहीं। अब तो जीना भी एक सज़ा सा लगा, क्योंकि प्रेम में बस मृत्यु है, मुक्ति नहीं।
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
