क्या फर्क पड़ता है......
तुम ही वो शख्स थे जो उलझा कर गए थे, उसने जुल्फ़े सवार ली तो क्या फर्क पड़ता है...... सिगरेट उधार ली होगी तुमने भी तो कभी, मैंने माचिस उधार ली तो क्या फर्क पड़ता है...... कई रातें गुज़ार चुकी हूं मैं तुम्हारे साथ भी, एक बाहर गुज़ार ली तो क्या फर्क पड़ता है...... मेरी जिंदगी तुम हो मुझे जिंदगी मानकर, किसी ने जिंदगी सुधार ली तो क्या फर्क पड़ता है...... क्या फर्क पड़ता है...... क्या फर्क पड़ता है...... LAKSHAY JAIN ❤️🩹
Ad
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
Shop Now →
