उठाओ मेरा सिंधुभार
जब हार हुआ कहां न हारा! अपनों ने ही दुत्कारा, जीवन लगती जैसे कारा, करो मेरा अब जीवनपार, उठाओ मेरा सिंधुभार, जन्म क्या यथार्थ मरण हेतु? गलना ही क्या अंत कहूं? मरने के डर से तुम्हें पूजूं? यह कैसा अत्याचार? उठाओ मेरा सिंधुभार
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