पूर्णिमा की रात्रि
पूर्णिमा निशि की अद्भुत छटा, मन-मानस को झकझोर रही; मनुज,चकोर व हरित पर्ण के मन में गुदगुदी हिलोर रही। चारुचंद्र की धवल रश्मियां, अवनि अँचल पर थिरक रही है; जन-जीवन की चंचल आँखे, पुलक-पुलक कर निरख रही है। यह शुभ्र बेला कामदेव को जंग हेतु ललकार रही है; रति मदमस्त अंगड़ाई ले उन्मत हो, फुफकार रही है। नरेंद्र सिंह 10.03.2024
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