अक्सर
अक्सर उस गली की ओर चली जाती हूँ मैं, उसके घर के दरवाजे को तकती रहती हूँ मैं। अक्सर उसकी एक झलक के लिए तरसती रहती हूँ मैं, उसके दिए यादों को दिल में छुपाए रखती हूँ मैं। अक्सर उसके साथ बिताए उन लम्हों को समेटे रखती हूँ मैं, उसको अपनी हर दुआ में माँग लेती हूँ मैं। अक्सर उसे याद कर के रो देती हूँ मैं, उसके दिए हुए जख्मों से भी इश्क करती हूँ मैं। अपने खयालों में बस उसे ही रखती हूँ मैं, उसके लिए खुद से ही लड़ती रहती हूँ मैं, कि अब वो मेरा नहीं... खुद को ही समझाती रहती हूँ मैं, नजाने क्यों उसे इतना चाहती हूँ मैं... ! कहता था जान हो तुम... सच मानू इसे या मेहेज झूठा कहू तुम्हें... अक्सर अब ये सवाल खुद से करती रहती हूँ मैं....!! अक्सर अब ये सवाल खुद से करती रहती हूँ मैं....!! -Rajni Konwar
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