जिंदगी बेवफा
ज़िंदगी बेवफ़ा ज़िंदगी, तुझसे मैंने बेहिसाब प्यार किया, हर दर्द तेरे सीने में उतर के स्वीकार किया। ये जानते हुए भी इक दिन तू साथ छोड़ देगी, तेरी हर मुस्कान में अपना संसार बसा लिया। तेरे वादों में कभी सावन की ठंडी बूँदें थीं, कभी वीराने में तूने सपनों की आग सुलगाई। पर सुकून के दो पल भी तूं मुझसे छीनती रही, हर बार दामन में सिर्फ तन्हाई की सौगात लाई। प्यार की तलाश में तुझे कितनी बार पुकारा, मगर तूं हर मोड़ पे नफ़रत का ज़हर घोल आई। माँ-बाप की ममता छीनी, दोस्तों का साथ छीना, जो भी अपनाया उसे वक़्त के अंधेरे में खो आई। हंसने के लम्हें कम थे तेरी किताब के पन्नों में, आँसूओं की इबारतें हर रोज़ नई कहानी कह गईं। कभी उम्मीदों की डोर थामकर बहलाया तूने, कभी सपनों को तोड़कर बेरहमी से रुला गई। फिर भी ए ज़िंदगी तुझसे शिकायत नहीं करता, तेरे हर धोखे को भी तजुर्बे का नाम देता हूँ। मुझे मालूम है आख़िर में तू साथ छोड़ जाएगी, मगर आख़िरी सांस तक तुझे गले लगाता हूँ। तूं बेवफ़ा है, मगर तुझसे बेइंतहा प्यार है, तेरे हर दर्द में भी इक अजीब सा इकरार है। तूं जितना सताएगी, मैं उतना मुस्काऊँगा, क्योंकि मौत भी आएगी तो तुझे छोड़ कर ही आएगी। - विजय शर्मा एरी
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