साहसी स्वदेशी
चट्टानों के सफेद कंबल के पार जब हमारी जान पर बोली लगाई जाती है तो मजबूत पेड़ के जैसे डटे खड़े हमारे हरे सिपाही हमारी नींद को महफूज रखते है। खून की लहरों से दाग़ित हर आंसू का जवाब दुश्मन का सीना फाड़कर दिया। हर गोली पर किसी मां के हाय, बहन के चीख या पिता के बेबसी से तराशा गया उसके निशाने का नाम। एक एक नाम मिटाकर करी हमने अपनी फतह हासिल और फिर एक बार गर्व से लहराया अपना तिरंगा।
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