अगणित गुज़रेशे
दिल की ख्वायशे बह गई अनकही जज़्बादों में। उनके दीदार को आंखें अर्से तक तरसती रही पर न मुलाक़ात हुई और ना ही वार्तालाप। बरसो का इंतिहा खत्म होने को आया तो घड़ी के काटे जैसे शरणों में नहीं घंटों में चलने लगी। इंतजार सिर्फ उस पल का जब उनके बाहों में खुद को महफूज पाए।
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