पहचान
पहचान, क्या है मेरी पहचान? कौन सी कहानी है जो मुझे बयां करती है? क्या है वो शब्द जो मुझे समझता है, और क्यू हर नज़र में मेरी पहचान बदल जाती है? किसी के सामने मेरी पहचान मेरे सपनों से होती है, तो किसी के सामने सिर्फ मेरी खामोशी से। कोई मुझे मेरी उम्मीदों से पहचानता है, और कोई सिर्फ मेरी गलतियों का शोर सुनती है। किसी के लिए मेरी पहचान मेरी जीत है, तो किसी के लिए मेरे हार में ही सब कुछ छुपा है। कोई मुझे मेरे सफर का मुसाफिर कहता है, और कोई मुझे मंजिल से दूर एक भटकता समझ आता है। कोई मुझे पैसे के तराजू में तोलता है, और किसी की नज़र में मेरी गरीबी मेरी पहचान बन जाती है। कोई अपनों के बीच मुझे अपना बनाता है, और कोई दुश्मनो के संग मुझे अजनबी कर जाता है। मेरी पहचान कभी मेरी सफलता से छुप जाती है, और कभी मेरी हर कोशिश से उबर आती है। किसी के लिए मैं एक समस्या हूं, तो किसी के लिए एक उत्तर जो कभी मिल नहीं सका। पर क्या मेरी पहचान बस दूसरे की आँखों का धोखा है? हां मेरी पहचान वही है जो मैंने खुद के लिए चुनी है? मेरी कहानी तो हर पल लिखी जा रही है, और मेरी पहचान उसकी कहानी का हर शब्द है।
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