वो पेड़ मर गया
एक सुबह की बात है— वह खिड़की से झाँक रहा था, आँगन के आम के पेड़ को देखता हुआ। कोयल गा रही थी, तोते मस्ती कर रहे थे, बारिश से नहाए पत्ते झिलमिला रहे थे। कितना विशाल, कितना हरा-भरा! न जाने किस प्रेम से जी रहा था। दादाजी कहते थे— “पेड़ भी जीते हैं, धूप सहते हैं, बरसात सहते हैं, ओर सावन में मुस्कुराते हैं।” समय बीता— घर वीरान हुआ, आँगन सुनसान पड़ा। पर पेड़ अब भी खड़ा था, मौन साक्षी, सबका साथी। सालों बाद लौटकर देखा तो— घर खंडहर-सा, दीवारों पर दीमक, आँगन घास से भरा, और पेड़… मानो बेजान ढांचा, ना जाने किस आस में जिंदा| सोचा— “पानी तो मिलता रहा होगा, फिर क्यों सूख गया यह?” उत्तर भीतर से आया— “पेड़ भी प्रेम से जीते हैं। जब इंसान चले जाते हैं, पक्षी खो जाते हैं, हँसी लौटकर नहीं आती— तो जड़ें भी टूट जाती हैं।” शायद वह अब भी इंतज़ार कर रहा था— किसी सावन, किसी हँसी, किसी प्रेम का। पर कोई न लौटा— ना उसके लिए ना उस घर के लिए और पेड़… मौन हो गया। ना जाने किस के लिए| ~Sandeep Semwal
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