सर्द रातें।
ठिठुराने वाली ये ठंडी सर्द रातें, समेटे हुए कुछ अनकही, अनजानी बातें। धीरे धीरे कोहरा अपने कदम बढ़ा रहा, अदृश्य पंख लगाकर तेजी से उड़ जा रहा, घड़ी की टिक टिक के साथ सन्नाटा भी छा रहा, काला बादल भी सर्दी को और बढ़ा रहा। दिन भर बढ़ते कदम भी मानो थम गए, नदी, झीलें, समुद्र भी जैसे जम गए। ठंडी हवा ने भी आतंक मचाया, पत्तों को पत्तों से टहनियों को टहनियों से लड़वाया। पहाड़ों पर हो रही है बर्फबारी, मस्त हवाओं ने मैदानों में आने की शुरू की तैयारी। पहाड़ सो गए ओढ़कर सफ़ेद चादर, कोहरे से ढके वृक्ष जैसे धरा को आलिंगन कर रहे बादर। जीर्ण शीर्ण कंबल में एक बुढ़िया करवटें बदल रही बार बार, थोड़ी ऊष्म देने वाली सूरज की धूप का कर रही इंतज़ार। उसकी उम्मीद भी धुंधली सी नज़र आई, अगली सुबह उस बुढ़िया के लिए मौत ही लाई।
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