राजनीति का चेहरा
प्रस्तुत है आज़ की राजनीति की सच्चाई को उजागर करती हुई एक 6-पैरा की हिंदी कविता — "राजनीति का चेहरा" ✍️ विजय शर्मा ऐरी नेता बदलते चेहरे जैसे, नकाबों की दुकान लगे, जनता भूखी मरती है पर, वो सत्ता की शान लगे। वादे सब जुमलों में खोए, सच की कोई बात नहीं, झूठ का सिक्का चलता ऐसा, जैसे हो सौगात कहीं। कुर्सी के इस खेल में अब, रिश्ते भी गिरवी रखे, धरती रोए, गंगा डोले, पर नेता चैन से बहके। विकास की बातें गूंगी हैं, भाषण ही ताली खाएं, सच बोलने वाला हर चेहरा, गुमनामी में साए। जात-पात के जाल बिछाकर, वोटों की खेती करते, मजहब के नाम पर लड़वाकर, इंसानियत से डरते। कभी मंदिर, कभी मस्जिद, कभी मूर्ति, कभी नाम, सच्चे मुद्दे छुप जाते हैं, बस बनता है बवाल तमाम। शिक्षा बिके बाजारों में, स्वास्थ्य बने व्यापार, गरीब मरे लाइन में खड़े, अमीरों को आराम पार। जनता पूछे — "कब सुधरोगे?", नेता हँसकर बोले, "तब जब तुम फिर से धोखा खाओ, फिर वोट हमें ही दो रे।" न्याय यहाँ बिकता है देखो, गवाह भी बिक जाते हैं, चोर नेता सम्मान पाते, और सच्चे फँस जाते हैं। कानून बनता सिर्फ उनके लिए, जो ऊँची कुर्सी वाले, आम आदमी के लिए बस, ठोकरें और ताले। पर उम्मीद अभी बाकी है, अगर युवा कुछ ठानें, कलम उठे, सवाल उठे, और बेईमानी हारे जानें। ईमान की लौ फिर जलती है, जब जागे जन की शक्ति, राजनीति फिर सेवा बनेगी, न होगी कोई सस्ती युक्ति।
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