आखरी ख़त
मुझे फ़र्क नहीं पड़ता के ये पहुँचे ना पहुँचे तुम तक बस मेरे दिल से निकल जाए इसलिए लिख रही हूँ तुम्हे एक आख़री खत तुम दिल में रहते नहीं पर थोड़ी तुम्हारे ख़यलो की है आहट वो शोर शांत हो जाए इसलिए लिख रही हुँ तुम्हे एक आख़री खत ना तुमसे बात करने का मन करता है और ना तुम्हे मिलने की है कोई चाहत बस मन में रह गए हैं कुछ सवाल इसलिए लिख रही हुँ तुम्हे एक आख़री खत तुम कहते हो तुम्हें दोस्त रहना हैं या शायद उसमे भी नहीं कोई सच तुम्हारे झूठ और मैं सुन नहीं सकती इस लिए लिख रही हुँ तुम्हे एक आख़री खत तुमसे न लगाव हैं न इकरार कुछ है तो बस शिकायत गिले जो कभी तुमसे कहे नहीं वो कहने के लिए लिख रही हुँ तुम्हें एक आखरी ख़त जाने हमारे बीच क्या रह गया है बेज़ार ही है शायद और बेज़ार ही रह जाए इसलिए लिख रही हुँ तुम्हें एक आखरी ख़त
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