प्रीत
राधा समझाए मोहन को "प्रियतम – प्रीत का गीत !" मोहन तो सर्वत्र हैं पर अब भूली रीत–अरीत। "आपकी बंसी मधुर है प्रिय अगर मैं तोडूं तो रोऊं भी ईर्ष्या है कि ओर मोहित हैं आपको भाती –सो सोऊं भी।" "प्रेम का कोई गीत ना गाओ कोई पुष्प , कोई हिरन ना लाओ तनिक बैठो पास मेरे, कान्हा यह घास, बादल, अनंत दिखलाओ।" मोहन को प्रीत प्रेम ना लागी "देह से स्पर्श, देह ही जागी प्रेम है कुंजी नश्वर–अनश्वर इसे जानी जो ब्रह्म जानी।"
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