मणिकर्णिका
जहाँ थमती है भागदौड़, जहाँ मिटते सब अभिमान हैं, मणिकर्णिका की गोद में, थमे हर इंसान के प्राण हैं। यहाँ पत्थर भी बोलते हैं, बस सुनने वाला चाहिए, मोक्ष की इस नगरी में, बस डूबने वाला चाहिए। मोह यहाँ राख बनकर, लहरों में मिल जाता है, मिट्टी का ये पुतला, फिर 'महादेव' हो जाता है। अस्सी की वो आरती, और मणिकर्णिका की आग, सिखाती है कि प्रेम ही है, जीवन का असली राग। सत्य ही शिव है यहाँ , बस अहंकार की आहुति दे, मिट्टी से बनी मूरत है, अब मिट्टी में ही प्राण दे l यहाँ लहरों में शिव का वास है, कण-कण में है सवेरा, कहती है गंगा यहाँ "विश्राम कर, अब खत्म हुआ तेरा-मेरा।" मणिकर्णिका की अग्नि हर प्रहर जहाँ अग्नि जले, यहाँ वैराग्य की होली है, यहाँ राख ही सावन है। ये संगम है उस 'स्व' का, जो 'सर्व' में मिल जाता है, काशी की इस विभूति में ही, मुक्ति की अभिलाषा है। एक ओर रोते अपने हैं, दूजी ओर सत्य का ज्ञान हो जाता है , अंत यहीं, आरंभ यहीं, यही जीवन की परिभाषा है I
Poetry Books 50% Off
Bestselling collections from top poets
