जाने ऐसा क्यों होता है
जाने ऐसा क्यों होता है हर सवेरे के बाद रात का पहरा होता है जब है डोर खुदा के हाथ मैं तो राहगीर दर दर क्यों भटकता हैं l यही खयाल मेरे जहन मैं बार बार आता है जो हम चाहते हैं ना जाने क्यों उसके परे हो जाता है l हैं खुदा तो क्यों मुसाफिर अपनी राह भटक जाता है चलते चलते सफ़र मैं मन गुमराह सा हो जाता हैं l हर शाम मेरे मन में ये सवाल आता हैं हर परिणाम के बाद काश शब्द क्यों रह जाता हैं l ये बैठा मन फिर खुदा के पास जाता हैं l वो कहता है l जब है डोर,मेरे हाथ में तो तू क्यों घबराता है राहगीर भटक भटक कर अपनी राह बनाता है है चंचल मन तेरा जो हर कुछ चाहता है इसलिए हर बार तेरे चाहत के परे हो जाता है l मुसाफिर चलते चलते राह भटक जाता है क्योंकि गुमराह मन भूल जाता है कि हर रात के पहरे के बाद सवेरा होता है l
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