पुरानी किताब
पुरानी किताब बदला नहीं था यूं कुछ भी फिलहाल मगर फिर भी बहुत कुछ बदल चुका था किस्मत के इस खेल में बनकर मोहरा कोई जिंदगी में एक नया पन्ना जोड़ने निकल चुका था प्रीत के धागों की न जाने कब शुरू हुई अंगड़ाई भटके इस दिल में होने लगी फिर जैसे कोई लड़ाई बावरे मन में बढ़ रही थी बेचैनियां कईं हर पल हर वक्त मैं भटकता रहता कहीं आंखों से दूर हो रहा था होले होले अंधेरा जैसे हो रहा था कईं सौ दुआओं का सवेरा मन मेरा अब जैसे मेरा ना रहा हो प्रीत के रंग में रंगे आसमान में कोई बसेरा हो थम चुका था वक्त उस हसीन लम्हे में बेपरवाह होकर नैनों से जब नैन मिले हसीन लम्हे में सुकून की बारिश भी अब होने लगी थी मोहब्बत की लौ भी आहिस्ता आहिस्ता बढ़ने लगी थी उसकी मुस्कान के पीछे कुछ यूं दीवाने बन बैठे थे बंदिशों को बेबाक होकर बस अनदेखा करने लगे थे वक्त न जाने क्यूं पंख लगाये उड़ता चला जा रहा था मेरी परवाह किए बगैर बस यूंही निकला जा रहा था मेरे शब्द मुझे पन्ना पलटने नहीं दे रहे थे रो रोकर हर दफा वही एक बात कह रहे थे उसकी चाहतें दिल में घर कर चुकी थी
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