चार बूंद आंसू
कितना आसान होता है न, चार बूंद आंसू गिराकर खुद को मासूम और सही बनाना। यूं ज़मीन से आसमान तक के नोक झोंक करना, सामने वाले को हद से ज्यादा ज़लील करना, फिर उसके सामने खुद को मासूम दिखाना। कितना आसान होता है न, चार बूंद आंसू गिराकर खुद को मासूम और सही बनाना। कभी सोचा है जो आंसू नहीं गिरा पाता, जो सही होकर भी सही नहीं हो पाता, जो दूसरे की ख़ुशी के लिए खुद को ज़लील कर जाता। तुम सोच भी कैसे सकते हो तुम्हें तो चार बूंद आंसू गिराना आता है, खुद को सही साबित करना आता है। इस मतलबी दुनिया में , तुम भी तो मतलब से काम रखते हो, तभी तो चार बूंद आंसू गिराकर फिर सुकून से किसी और के साथ बस जाते हो। Amrit Anand
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