मोहब्बत...
मिलते हैं जब दो नफ़्ज यहाँ ठहर जाता है समां.... वो लेहजे वो हाफिजा.... हाय रब्बा !! शर्मा जाता है नूर -ए- जहाँ.. वो पहली रात,और आखिरी बात, जब एक याद बन जाती है.. तब मुकद्दर अपना रिवायत निभाती है , यादौ के उन भूल भुलैया मे ले जाती है, जहाँ बस यादें ही साथ निभाती है.... कहते हैं वजूद की दास्तान और, मोहब्बत की वास्ता, आगाज है महबूब केे ताराज की.. मुकद्दर भी साथ छोड़ जाती है, जब मोहब्बत अपना तिजारत लगाती है.. सर-ए -महफ़िल मे बदनामी होती है , इश्क़ की अलग कहानी होती है, कोई खोता है....कुछ छूट जाता है, मिलना तो बस एक इत्तेफाक़ बन जाता है.... तसल्ली ना मिलेगी झूठी यहाँ, होना पड़ेगा फना.. रब की इनायत होगी... जिनकी मोहब्बत रिफाकत होगी...!!
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