आस्तिन के साप
आस्तिन के साप ======================= पुरी नीव बनायी मरे लीये, मेरे वंशज और मेरे आपने बापने, दुनीयाकी लाख ठोकरे,खाकर, एक खरोच तक न आयी मुझे, ऊन की बदौलत आजतक. मेरी माॅं और बापको, क्या सीला दीया, ऊन आस्तिन के सापोने. पाले थे कुच ईंन्सा भले समजकर, लेकीन वो तो हलके जाती के , अस्तित्वात के साप नीकले. कुचल ने को तो ऊनका फन, कभीका कुचला होता. मगर मजाही क्या आता ऊनका, कर्मा कब देख पाता....., कुछ कुछ बचे हुये अभी भी दुरसेही...., निहार रहे मुझे आस्तिन के साप. ऊनको क्या मालुम की अब, जहर का मुझपर असर नही होता, जहर का मुझपर असर नही होता. =============================
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