चिंतन
●●● हमारा जीवन और मरण एक घिसे पिटे रिकॉर्ड की तरह है जो कालांतर में अनेकों बार बजा है और निरन्तर बजता ही जा रहा है। परंतु माया के वशीभूत होने के कारण हमें याद ही नहीं रहता, कि ये संगीत हमने पहले कभी सुना है। इसी लिए हर जन्म में हम सब बेपरवाह हो कर उसकी धुन पर नाचते रहते हैं। ईश्वरीय कृपा प्राप्त, हम में से कोई बिरला होता है जिसको सब कुछ याद रह जाता है। इसलिए हे मानव श्रेष्ठ अपने निरन्तर प्रयासों से इस अनवरत प्रक्रिया में बदलाव संभव हैं। ●●● ©deovrat 'अयन' 29.04.2025
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